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1.
उम्मीद रखना मेरी फ़ितरत है
टूटती है, फ़िर जोड़ लेता हूं

ज़ायका-ए-हिज्र बदल लेता हूं

2.
कभी अन्जाने में यूं ही ’चांद’ कहा था तुमको
न था इल्म कि इतनी लम्बी अमावस होगी

टुकड़े चांद के चुभते हैं गीली आन्खों में

3.
तेरे तग़ाफ़ुल की मैं कोइ शिकायत नही करता
तूने दुनिया की रिवाज़ों से ज़ुदा कुछ ना किया

सर पे हो धूप तो साये भी रूठ जाते हैं

4.
तुमने जाते वक़्त एक बार मुड़ के देखा था
ये मेरा वहम है या सच – मुझे याद नहीं

नज़रें गीली थीं, नज़ारे भी धुंधले-धुंधले थे

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Ek Ghazal…

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ख़ुद की तलाश मेरी मुकम्मल हुई अभी
ग़ुज़रा जो तुझसे होके मेरा कारवां अभी

तस्वीर की मानिंद मुख़ातिब हुए मगर
खुल जाओगे तुम, पहली मुलाक़ात थी अभी

खिलने लगी हैं राहें गुलमोहर के फूलों से
मौसम भी वस्ल-ए-यार में है मेहरबां अभी

पढ़ता रहा चुपचाप तेरे पलकों की सिलवटें
गोया दिल-ए-तबाह की थी इब्तिदा अभी

पैसे न फेंको, मैं महज़ थक के बैठा हूं
सलामत हैं, ऎ दोस्त, मेरे दस्त-ओ-पा अभी

अपने करीबियों से मैं उम्मीद रखता हूं
बचा रखीं हैं थोड़ी बहुत नादानियां अभी

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हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
वक्त की शाख से लम्हें नही तोड़ा करते

अब तो मरासिम में भी पहले-सी वो गर्मी ना रही
जो बची भी है, वो बस सीलन है रिश्तों की
मैं किसी को भी गुनहगार नहीं ठहरा सकता
बहुत मुमकिन है, हम शिकार हों रवायतों की

किया है फिर मज़ाक मौसम ने, तेरी याद ले आयी
दो सूखी निगाहों में कुछ क़तरें हैं, ताज़े हैं
वो मेरा शॉल पहनाना तुम्हें दिसम्बर की शामों में
फिर कब तुमने मेरे मफ़लर से मेरे कान ढांपे हैं?

एक मुद्दत हुई अब तो मुझे तुमसे ज़ुदा जीते
ये झूठ होगा जो कह दूं कि तुम अब याद नहीं आते
मैं क्या करूं कि मेरे ज़ेहन के बंज़र ज़मीनों पे
सिवा तेरे खयालों के कोइ मौसम नहीं आते

इक यक़ीं और है जिसके सहारे मैं भी जीता हूं
मेरी वफ़ा की पाकीज़गी के असर कुछ तो होते होंगे
उफ़क़ के पास से खाली निगाहें जब लौटती होंगी
मेरी हस्ती के धुंधले अक्स-से आन्खों में बनते होंगे

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है


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आपने कभी
नौकरी की अर्ज़ियां भरी हैं ?
उनमें पते लिखने के
दो खाने होते हैं –  
स्थायी पता,
वर्तमान पता ।  
 
मैं बड़े पेशोपेश में पड़ जाता हूं
साधारण से दिखने वाले
इन खाली खानों की पेचीदगियों पर,
क्या लिखूं यहां
जो सही हो ?
 
स्थायी पता –  
मेरा गांव !
जहां मैं
पिछले कई सालों से नहीं रहा
और बहुत मुमकिन है
कि मेरे स्थायी पते का डाकिया भी
मुझे मेरे नाम से नहीं पहचाने ।
 
वर्तमान पता –
इस बड़े शहर की
संकरी सी गली में
इक किराये की छत,
जो  
हर आठ – दस महीनों में  
बदल जाया करती है ।
 
मैं समझ नहीं पाता
क्या लिखूं यहां ?
 
ये दो खाने
मेरी बिखरी हुई हस्ती का
एहसास कराते हैं
और इनका खालीपन
मेरी सिफ़र से सिफ़र तक के सफ़र की
याद दिलाते हैं ।

 

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खुद में उलझा मैं खुद की तलाश करता हूं
ग़ुम हुआ जाता हूं जितनी तलाश करता हूं
 
उदास रूह भी तकाज़ा-ए-वस्ल करती है
ज़िस्म की क़ैद में उसकी तलाश करता हूं
 
हैरत में डाल देती हैं नब्ज़ों की हरक़तें  
सांस लेता हूं, ज़िन्दगी तलाश करता हूं
 
सफ़र में यूं तो मेरे क़ाफ़िले हैं साथ मगर
वो कौन है? मैं किसकी तलाश करता हूं
 
शहर है ये, बड़ी मसरूफ़ियत है लोगों में
मुनक़्कश दीवार में खिड़की तलाश करता हूं
 
अजीब शक्लें हैं, अदब-ओ-खुलूस में लिपटी हुयीं
ज़हीनों में वफ़ा की तलाश करता हूं
 
असर है वो तेरे जल्वों का ज़ेहन पर कि ’शफ़क़’
हद-ए-निगाह तक तेरी तलाश करता हूं

Jhooth !!!

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कल जाते वक़्त
कितनी आसानी से तुमने कह दिया था
“मुझे याद करना”
तुमने तो बस कहा था
लेकिन मैने सुना था
और ये तीन हर्फ़ गूंज़ते रहे
मेरे ज़ेहन में
लगातार
 
और आज
जब तुम मुझसे फिर मिली हो
तो मैं बस यही कहना चाहता हूं
कि मैने तुम्हे याद नहीं किया
बस जब भी आन्खें बन्द करता था
तो तुम्हरी शक्ल सी बनती थी  
मेरी बन्द आन्खों में ।
कानों में भी कुछ आवाज़ें बज़ रही थीं
शायद तुम्हारी ही थीं
और जब भी मेरी खिड़की से  
ठंडी हवा आती
एक अज़ीब-सी खुशबू साथ लाती
बिल्कुल तुम्हारी खुशबू के जैसी
 
लेकीन ये भी सच है
मैनें तुम्हे याद नही किया
बस तुम याद आ गयीं
 
जबकी मुझे भी पूरा यक़ीन है
कि तुम्हे भी ये याद नही होगा
कि तुमने मुझसे ऐसा कुछ कहा है
लेकिन मैने तुम्हारा कहा जिया है !!!

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